ग़ज़ल
फ़कत मैं ही था तेरे जलवे से बेखबर.... ,
ज़िक्र जिस से भी किया तेरा दीवाना निकला !!
मरकज़ -ऐ - बज़्म ना बन सकी हमारी किस्सागोई ,
तेरा हर शे'र पक्का निशाना निकला ...!!
जाऊं सदके मैं तेरी सुखनवरी के .....
तेरा हर बोल इक्क तराना निकला !!
साकी-ऐ-महफ़िल बने जब भी तुम....,
हाथ में हर शख्स के पैमाना निकला..!!
इस कद्र तेरे रंग में रंग गयी बस्ती... ,
हर इक मोड़ पर नया मैख़ाना निकला॥!!
मात खा गये हम पेशीनगोई में.... ,
तू आम शख्स नही, नूर-ऐ-ज़माना निकला ॥!!
---- राकेश वर्मा
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